"गिरता पंजाब"
ये वो वक्त था जब पंजाब को "पंज-आब"(पाँच दरियाओं का प्रदेश) कहा जाता था। उस वक्त "पंज-आब" अपनी बाल अवस्था में था , इसलिए शायद इसे , इसके अपने ही शरीर के हिस्सों का बंटवारा करवाना पड़ा। इसे राजनीतिक हेर-फ़ेर कहा जा सकता है या फिर ये कि कुछ जनूनी क़िस्म के नक्चडों ने अपने किये गए फैसलों को "ख़ुदा की मर्जी" का नाम दिया। जिसका नतीजा ये रहा कि बंटवारे के समय पंजाब के दो हिस्से कर दिए गए। जितना शोक बंटवारे का इंसानियत को हुआ , उससे कहीं ज्यादा संताप बंटवारे का पंजाब को भुगतना पड़ा। "पंज-आब" से बने "पंजाब" की तरफ़ ना तो किसी ख़ास समुदाय ने और ना ही किसी राजनीतिक़ सख्शियत ने ध्यान दिया। इसे तो सौंप दिया गया भूखें भेड़ियो को, जो अपने अपने फ़ायदे के लिए इसे अन्दर से दीमक की तरह खोखला करते गए। इसका नतीज़ा ये निकला कि जिस पंजाब को बचपन के बाद अपनी जवानी में पहुँचना था , वो अपनी बाल अवस्था से सीधे ही बुढ़ापे में पहुँच गया। इसका दुष्प्रभाव हुआ पंजाब में रहने वाले भोले-भाले और मेहनती पंजाबियों पर की जिन्दगी और उनके रहन-सहन पर।
इसके आगे की कहानी में यही दिखाने का प्रयास किया गया है कि कैसे पंजाबियत को पूरी दुनिया में शर्मसार होना पड़ा।
इसके आगे की कहानी में यही दिखाने का प्रयास किया गया है कि कैसे पंजाबियत को पूरी दुनिया में शर्मसार होना पड़ा।
१४ अगस्त १९४७ की आधी बीत चुकी रात को बिशन सिंह अपने बिखरे परिवार को इक्ठा करने में लगा हुआ था। उसकी पत्नी और दो बच्चों का कहीं कोई अता-पता नहीं था। घर में कुछ पशु थे जिन्हे उपद्रवी कब के ले भागे थे। कुछ दंगाईयों ने तो बिशन सिंह के घर पर हमला कर उनका सब कुछ तहस-नसह कर दिया था। बिशन ने किसी तरह भाग कर अपने चार में से दो बच्चों (बलदेव और शिवदेव) को पास वाले गुरुदुआरे में छुपाया था और ख़ुद अपनी पत्नी(महिताब कौर) और दो बच्चों ( परनीत और हरजीत) को ढूंढने चला गया। बिशन जैसे ही गाँव से बाहर जाने वाली गली में निकला अपने सामने दंगाइयों की १ टोली को देख घबरा गया और भाग कर नज़दीक़ ही धोबी के मकान में शरण ली थी। उस मकान में पहले से ही मुस्लमान परिवारों की औरतें और बचे सहमे हुए बैठे थे। अपने सामने १ किरपान धारी सिख को देख वो घबरा गए थे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे थे। इससे पहले कि बिशन को कुछ समझ में आता दंगाईयो को बिशन की मौजूदगी का पता चल गया था और वो बिशन को मारने के लिए दौड़े। उस रात बिशन सिंह ने पहली बार अपनी मौत को बहुत करीब से देखा था। वो एक दम सुन्न हो चुक्का था और उसके पैर बिलकुल जम गए थे। वो दंगाईयो को हाथों में तलवारें लिए दौड़ते हुए अपने पास आते देख रहा था , पर वो भाग नहीं रहा था (या वो भाग नहीं सकता था) । जैसे ही एक दंगाई ने बिशन को मारने के लिए अपनी तलवार को हवा में ऊपर लहराया तभी अचानक जैसे बिशन में किसी दैवीय शक्ति ने प्रवेश किया और बिशन ने पूरे जोर के साथ उस दंगाई को पीछे धकेला और वहां से गुरुदुआरे की तरफ़ भागा।
दंगाईयों ने बहुत दूर तक बिशन का पीछा किया लेकिन बिशन तो सर पे पैर रख कर भाग रहा था। जब उसने ये पक्का किया कि अब कोई पीछे नहीं आ रहा था , तभी उसने गुरुदुआरे का रुख़ किया था। गुरुदुआरे पहुँचने पर उसे पता लगा था कि पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का बंटवारा हो चुका था। हिन्दुस्तान से पहले ही अंग्रेजो ने 'जिया अली जिन्हा' के कहने पर पाकिस्तान को आज़ादी दे थी और इसी आज़ादी की वजह से अब पाकिस्तान में से सभी सिखों और हिन्दुओ को यहां से निकाला जा रहा था। "ये बहुत बुरा किया पाकिस्तान सरकार ने साढ़े नाल," - बिशन सिँह के मुँह से
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